Tuesday, 4 September 2012

सुनता हैं गुरु ज्ञानी

सुनता हैं गुरु ज्ञानी गगन में,
आवाज हो रही झिनी झिनी - (धृ)


पाहि लीयाये नाद बिंदु से,
पीछे जमया पानी हो जी
सब घट पूरण बोली रह्या है,
अलख पुरुष निर्बानी हो जी ll 1 ll

वहां से आया पता लिखाया,
तृष्णा तौने बुझाई ..
अमृत छोडसो विषय को धावे,
उलटी फाँस फंसानी हो जी ll 2 ll

गगन मंडलू में गौ भी आनी
भोई पे दही जमाया...
माखन माखन संतों ने खाया,
छाछ जगत बापरानी हो जी ... ll 3 ll

बिन धरती एक मंडल दीसे,
बिन सरोवर जूँ पानी रे
गगन मंडलू में होए उजियाला,
बोल गुरु-मुख बानी हो जी ll 4 ll

ओऽहं सोऽहं बाजा बाजे,
त्रिकुटी धाम सुहानी रे
इडा पिंगला सुखमन नारी,
सुनत भजन पहरानी हो जी ll 5 ll

कहत कबीरा सुनो भई साधो,
जानी अगम के बानी रे..
दिन भर रे जो नज़र भर देखे,
अजर अमर वो निशानी हो जी ... ll 6 ll

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